January 22, 2026

उत्तराखंड की सियासत में बिगड़े बोल और “बवाल”

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उत्तराखंड की राजनीति में इस समय ऐसा “प्रेम प्रसंग” चल रहा है, जिसे देख कर टीवी सीरियल वाले भी शरमा जाएं। भाजपा मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के बिगड़े बोलों ने ऐसा बखेड़ा खड़ा कर दिया कि सरकार के तमाम फैसले बैकग्राउंड स्कोर बनकर रह गए हैं। भू-कानून, यूसीसी, नया बजट—सब किनारे पड़े हैं, और सुर्खियों में सिर्फ “प्रेम कथा” चल रही है।

बजट सत्र से शुरू हुआ हंगामा अब उत्तराखंड की सरहदें लांघकर दिल्ली तक जा पहुंचा है। प्रवासी उत्तराखंडी 2 मार्च को मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के विरोध में सड़कों पर उतरेंगे, मानो “दिल्ली चलो” आंदोलन का नया संस्करण तैयार हो रहा हो। उधर, कांग्रेस, उक्रांद और बेरोजगार संघ ने अपने-अपने प्रदर्शन फाइनल कर दिए हैं। कुल मिलाकर मामला ऐसा है कि प्रेम-विरोधी और प्रेम-समर्थक अपने-अपने मोर्चे पर डटे हुए हैं, मानो विधानसभा की जगह कोई कुश्ती का अखाड़ा हो।

सदन में “प्रेम” का गुबार, नेताओं की फूटी तकदीर

मंत्री प्रेमचंद की बयानबाजी का गुबार अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि इसने स्पीकर ऋतु खंडूड़ी, मंत्री सुबोध उनियाल और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को भी लपेटे में ले लिया।

स्पीकर ऋतु खंडूड़ी ने सदन में कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला को टोका तो लगा कि “संविधान की रक्षा” कर रही हैं, मगर जनता को यह किसी पुराने ज़मींदार की “डांट-डपट” जैसी लगी। अब विरोधियों ने इसे पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा बना दिया और स्पीकर साहिबा को सफाई देते हुए खुद को “फौजी की बेटी” तक कहना पड़ा। लेकिन जनता का मूड ऐसा है कि इस बयान के बाद भी विरोध के तवे पर सियासी रोटियां और तेज़ी से सिकने लगीं।

मंत्री सुबोध उनियाल की पुरानी टिप्पणी, जिसमें उन्होंने “पहाड़ियों के बाहर से आने” की बात कही थी, अब सोशल मीडिया पर नए मसाले के साथ परोसी जा रही है। उनकी तुलना एन.डी. तिवारी और हेमवती नंदन बहुगुणा से की गई थी, लेकिन जनता इसे उतना ही बेमेल मान रही है जैसे गधे को घोड़ा बनाना।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मंत्री प्रेमचंद को नसीहत देकर मामले को संभालने की कोशिश की, मगर जनता ने इसे “डैमेज कंट्रोल” के बजाय “पॉलिटिकल पावर कट” मान लिया। इसी बीच, किसी रिसॉर्ट या होटल में हिस्सेदारी की कहानी ने आग में घी डालने का काम कर दिया। कुल मिलाकर, पार्टी में प्रेमचंद का मामला अब ऐसा हो गया है जैसे शादी में बेस्वाद दाल—ना निगली जा रही, ना उगली।

सीएम धामी: संकट मोचक या मजबूरी के खिलाड़ी?

सीएम पुष्कर सिंह धामी ने तुरंत “शांति वार्ता” का तरीका अपनाया और प्रेमचंद से खेद व्यक्त करवा दिया। लेकिन विरोधियों को इससे इतना ही संतोष मिला जितना चाय में चीनी डालने के बाद बिना मिलाए पीने से आता है। धामी जी का “हम सब उत्तराखंडी हैं” वाला बयान किसी पुराने हिंदी फिल्मी गाने की तरह सुनने में अच्छा लगा, लेकिन इसने विवाद की आग बुझाने के बजाय इसे और ज्यादा हवा दे दी।

अब भाजपा क्या करे?

भाजपा के बड़े रणनीतिकार अब इस “प्रेम संकट” का हल ढूंढने में जुटे हैं। पार्टी का माथा ठनक रहा है कि क्या प्रेमचंद अग्रवाल को हटाया जाए या उन्हें “संस्कारों” की ट्रेनिंग दी जाए? दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन की पटकथा तैयार हो चुकी है और भाजपा हाईकमान अब ऐसे “राजनीतिक ज्योतिषी” की तलाश में है जो इस ग्रहदशा से पार्टी को निकाल सके।

उत्तराखंड की राजनीति में इस समय ऐसा घमासान मचा है कि अगर महाभारत का दोबारा प्रसारण कर दिया जाए, तो भी दर्शकों को कम रोमांच मिलेगा। सरकार के विकास कार्यों का शोर कहीं खो गया है, और हर तरफ बस “प्रेम कथा” गूंज रही है। भाजपा को अब कोई ऐसा फार्मूला ढूंढना होगा, जिससे माहौल में जहर की जगह रस घुल जाए। लेकिन इस समय तो हालात ऐसे हैं कि “रस” की बजाय जनता भाजपा के “रसगुल्ले” में मिर्ची डालने पर उतारू है!

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