विधायक अरविंद पांडे विवाद: भाजपा में गुटबाजी का नया चैप्टर, 2027 से पहले BJP के सामने बड़ी चुनौती
रुद्रपुर: उत्तराखंड की भाजपा सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री और गदरपुर विधायक अरविंद पांडे हाल के दिनों में लगातार चर्चा में बने हुए हैं। सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण के आरोपों से शुरू हुआ विवाद अब पार्टी की आंतरिक राजनीति तक पहुंच गया है।
जहां एक ओर पांडे इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं, वहीं भाजपा नेतृत्व एकता बनाए रखने की कोशिश में जुटा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी विधानसभा सत्र और 2027 के चुनावों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन पार्टी इसे व्यक्तिगत मामला बताकर निपटाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
अतिक्रमण नोटिस और आरोप-प्रत्यारोप
विवाद की शुरुआत 20 जनवरी को गदरपुर तहसील प्रशासन द्वारा जारी नोटिस से हुई, जिसमें पांडे के कैंप ऑफिस को सरकारी भूमि (खाता संख्या 64, खसरा संख्या 12जी, क्षेत्रफल 0.158 हेक्टेयर) पर अवैध निर्माण बताते हुए 15 दिनों में हटाने का आदेश दिया गया। यह कार्रवाई नैनीताल हाईकोर्ट की याचिका के अनुपालन में की गई, जहां भूमि को ‘नदी की तलहटी’ श्रेणी में रखा गया है। पांडे के पुत्र अतुल पांडे ने नोटिस प्राप्त किया और कहा कि इसका जवाब अदालत में दिया जाएगा। पांडे ने इसे ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया और सीबीआई जांच की मांग की।
इससे पहले, बाजपुर में भूमि धोखाधड़ी के आरोप लगे, जिसमें पांडे परिवार पर जान का खतरा जताने वाले शिकायतकर्ता शामिल हैं। एक अन्य मामले में, पांडे पर धोखाधड़ी का आरोप लगाने वाली महिला के घर पर बुलडोजर कार्रवाई की धमकी दी गई, जिसे कांग्रेस ने ‘प्रतिशोध की राजनीति’ बताया। पांडे ने एक वीडियो में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और एसएसपी को ‘ईमानदार’ बताते हुए अन्य अधिकारियों पर सवाल उठाए, जो पार्टी के भीतर बहस का विषय बना।
आयोजन का ऐलान और अचानक रद्द होना
विवाद के बीच पांडे की ओर से एक आयोजन का ऐलान किया गया था, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा, विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक समेत कई विधायक और नेता शामिल होने वाले थे। हालांकि, यह कार्यक्रम अचानक रद्द हो गया। पांडे का कहना है कि उन्होंने खुद सभी नेताओं को फोन करके नहीं आने का अनुरोध किया, ताकि विवाद को और न बढ़ाया जाए।
इस घटनाक्रम ने भाजपा में गुटबाजी की अफवाहों को हवा दी है। कुछ राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी की आंतरिक कलह का संकेत माना जा रहा है, जहां पांडे जैसे वरिष्ठ नेता सरकार की कुछ नीतियों से असंतुष्ट हैं। हालांकि, भाजपा सूत्रों का कहना है कि यह कोई गुटबाजी नहीं, बल्कि पांडे का व्यक्तिगत निर्णय था, और पार्टी एकजुट है। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पहले भी सरकार पर कुछ टिप्पणियां की थीं, लेकिन पार्टी ने उन्हें आंतरिक मामला बताया। पांडे ने गदरपुर में एक शक्ति प्रदर्शन किया, जहां बड़ी भीड़ जुटाई गई, जो उनके स्थानीय प्रभाव को दर्शाता है।
एकता पर जोर, लेकिन असंतोष की सुगबुगाहट
भाजपा नेतृत्व ने इस मुद्दे को ‘व्यक्तिगत और कानूनी’ बताते हुए पार्टी की एकता पर जोर दिया है। मुख्यमंत्री धामी के करीबी सूत्रों का कहना है कि सरकार अतिक्रमण के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई कर रही है, और किसी को छूट नहीं दी जाएगी। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पांडे का आयोजन रद्द करना समझदारी का फैसला था, जो विवाद को बढ़ने से रोकेगा। हालांकि, कुछ विधायकों की दिल्ली लॉबिंग और कैबिनेट विस्तार की चर्चाओं के बीच असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। पांडे के समर्थक उन्हें ‘भू-माफियाओं के खिलाफ लड़ने वाला नेता’ बताते हैं, जबकि आलोचक इसे ‘दोहरी नीति’ कहते हैं।
गुटबाजी पर हमला
कांग्रेस ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा हेट स्पीच और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है, लेकिन अब अपने नेताओं पर कार्रवाई से बच रही है। वे आयोजन के रद्द होने को ‘भाजपा की गुटबाजी का प्रमाण’ बताते हैं, जो सरकार की कमजोरी दर्शाता है। सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ी है, जहां पांडे के समर्थक उन्हें ‘जनता का मसीहा’ कहते हैं, जबकि विपक्षी ‘सत्ता के दुरुपयोग’ पर सवाल उठा रहे हैं।
व्यापक राजनीतिक प्रभाव: चुनौती या अवसर?
यह विवाद उधम सिंह नगर जैसे जिलों में भाजपा की एकता को चुनौती दे सकता है, जहां पांडे का मजबूत आधार है। हालांकि, पार्टी इसे अवसर के रूप में देख रही है, जहां कानूनी कार्रवाई से ‘साफ-सुथरी छवि’ मजबूत होगी। विश्लेषकों का कहना है कि यदि मुद्दा बढ़ा, तो धामी सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी होगी, लेकिन फिलहाल दोनों पक्ष संतुलन बनाए रखने की कोशिश में हैं। पांडे ने सीबीआई जांच की मांग दोहराई है, जो मामले को और आगे ले जा सकती है।
