April 24, 2026

23 अप्रैल 1930 पेशावर : जब रॉयल गढ़वाल राइफल्स सैनिकों ने कहा-“हम अपने भाइयों पर गोली नहीं चलाएंगे

0
Screenshot_2026-04-23-19-51-35-10_40deb401b9ffe8e1df2f1cc5ba480b12.jpg
  • प्रशांत सी. बाजपेयी

ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के क़िस्सा ख्वानी बाज़ार में एक बड़ा और दर्दनाक नरसंहार हुआ। यह घटना महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय की है, जब देशभर में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध तेज़ हो रहा था।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (अब पाकिस्तान में) में खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान, जिन्हें ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जाना जाता है, ने खुदाई ख़िदमतगार संगठन के माध्यम से अहिंसा का संदेश फैलाया। उनकी और अन्य नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में 23 अप्रैल को क़िस्सा ख्वानी बाज़ार में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया।

सुबह से ही बड़ी संख्या में निहत्थे लोग—पठान, व्यापारी और आम नागरिक—बाज़ार में एकत्र हो गए थे। इस आंदोलन में सभी धर्मों के लोगों ने भाग लिया और पूरी तरह अहिंसक तरीके से विरोध जताया।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेज़ों ने बख्तरबंद गाड़ियां भेजीं, जो भीड़ में घुस गईं। इस दौरान एक गाड़ी में आग लगने से हालात और बिगड़ गए। इसके बाद ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ की 2/18 बटालियन समेत अन्य ब्रिटिश सैनिकों को बुलाया गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया गया और निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई। इस गोलीबारी में लगभग 400 से 600 लोग मारे गए, जबकि 1200 से अधिक लोग घायल हुए। यह घटना 1919 के जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बाद एक और बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई।

हालांकि, इस घटना में एक महत्वपूर्ण और साहसिक पहलू भी सामने आया। रॉयल गढ़वाल राइफल्स की दो प्लाटून ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में सैनिकों ने अपने हथियार नीचे रख दिए और कहा कि वे अपने ही देशवासियों पर गोली नहीं चलाएंगे।

इस अवज्ञा के चलते उन्हें कोर्ट-मार्शल का सामना करना पड़ा और कठोर सज़ाएं दी गईं, लेकिन उनका यह कदम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नैतिक साहस और देशभक्ति की मिसाल बन गया।

क़िस्सा ख्वानी बाज़ार का यह नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और मार्मिक अध्याय के रूप में दर्ज है। इस घटना में शहीद हुए सभी लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिन्होंने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *