September 12, 2026

BRICS समिट में अमेरिका पर भड़के रूस और ईरान, मेजबान भारत के लिए चुनौतियां?

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नई दिल्ली। ब्रिक्स बिजनेस फोरम में रूस और ईरान ने अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की प्रतिबंधात्मक नीतियों और सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए ब्रिक्स देशों से आर्थिक दबाव और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए साझा रणनीति विकसित करने की अपील की। दोनों देशों के बयानों के बीच भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ब्रिक्स मंच पश्चिमी देशों के विरोध का मंच न बन जाए और भारत की बहु-संरेखीय विदेश नीति का संतुलन कायम रहे।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ईरान पर लगाए गए विभिन्न प्रतिबंधों ने आर्थिक दबाव बढ़ाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के महीनों में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के कारण यह दबाव और गंभीर हुआ है। उनके मुताबिक, इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

पेजेशकियन ने कहा कि किसी देश के व्यापार, ऊर्जा ढांचे या वित्तीय प्रणाली पर राजनीतिक अथवा सैन्य दबाव का असर केवल उस देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।

पुतिन ने प्रतिबंधों और दबाव की आलोचना की

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी पश्चिमी देशों की नीतियों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कुछ देश अपना पुराना वैश्विक प्रभाव वापस हासिल करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके लिए सैन्य बल तक का सहारा लिया जा रहा है।

पुतिन ने औद्योगिक और लॉजिस्टिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने, अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों को बाधित करने और समुद्री परिवहन पर नियंत्रण स्थापित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाले देशों पर तथाकथित द्वितीयक प्रतिबंधों की धमकी देकर दबाव बनाया जा रहा है।

भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

रूस और ईरान के इन बयानों ने भारत के सामने ब्रिक्स के भीतर संतुलन बनाए रखने की चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है। भारत एक ओर रूस और ईरान समेत ब्रिक्स देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी उसके महत्वपूर्ण व्यापारिक एवं रणनीतिक संबंध हैं।

ऐसे में भारत की कोशिश रहेगी कि ब्रिक्स का एजेंडा आर्थिक सहयोग, विकास, वैश्विक दक्षिण की आवाज और बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने तक केंद्रित रहे तथा यह किसी एक देश या समूह के खिलाफ राजनीतिक मंच में तब्दील न हो।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार और नए निवेश तंत्र पर जोर

राष्ट्रपति पुतिन ने ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार, बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी परियोजनाओं के लिए नए निवेश प्लेटफॉर्म की जरूरत बताई। उन्होंने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ भरोसेमंद वैश्विक परिवहन मार्गों के विकास पर जोर दिया।

पुतिन ने ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे मार्गों को विकसित करने में सहयोग की इच्छा जताई। उनका कहना था कि ऐसे गलियारे वैश्विक व्यापार और आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

वहीं, पेजेशकियन ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान अपने बड़े ऊर्जा भंडार और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण ब्रिक्स की खाद्य, ऊर्जा और परिवहन आपूर्ति शृंखला में महत्वपूर्ण साझेदार की भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

10 अरब डॉलर के री-इंश्योरेंस पूल का प्रस्ताव

ईरानी राष्ट्रपति ने करीब 10 अरब डॉलर की शुरुआती राशि के साथ एक री-इंश्योरेंस पूल बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इसके अलावा उन्होंने ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई।

पुतिन ने भी न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका मजबूत करने और इसके माध्यम से निवेश के नए प्लेटफॉर्म को विकसित करने का समर्थन किया। दोनों नेताओं के बयानों से संकेत मिलता है कि ब्रिक्स के भीतर आर्थिक सहयोग, वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और स्वतंत्र आपूर्ति शृंखलाओं को लेकर चर्चा आगे बढ़ सकती है।

भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन पहलों में अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाते हुए ब्रिक्स को ऐसा मंच बनाए रखे, जो वैश्विक दक्षिण के हितों की आवाज उठाए, लेकिन किसी विशेष देश या पश्चिमी गठबंधन के खिलाफ ध्रुवीकरण का माध्यम न बने।

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